Monday, 2 May 2022

डीडवाना की रोचक जानकारी जिसको आपको जानना चाहिए

 निरंजनी सम्प्रदाय व माहेश्वरी समाज की उद्गम स्थली एवं देश के प्रसिद्ध उद्योगपति बांगड़ परिवार का गृह नगर यह डीडवाना अत्यन्त प्राचीन है जो कि लगभग दो हजार वर्षो से अस्तित्व में बताया जाता है परन्तु यहां मानव गतिविधियां लाखो वर्षो से जारी है, जिसके प्रमाण यहां खुदाई में प्राप्त औजार है। एक ऐतिहासिक शिलालेख के आधार पर इस नगर की स्थापना आभानगरी के नाम से वर्तमान शहर से पूर्व दिशा में 43 ईस्वी संवत में हुई जो की कुषाण साम्राज्य के अधीन थी। स्थानीय ख्यातों के अनुसार क्षत्रप साम्राज्य के शासको के आक्रमणो के कारण उजड़ गई और इस नगरी के प्रधानमंत्री शेषराम माहेश्वरी के पुत्र डीडूशाह ने डीडवाना नगर की स्थापना वर्तमान स्थान पर की। डीडूशाह के नाम पर डीडूवाणक नाम से भी जाना जाता था और उनके नाम पर डीडवाणा नामकरण हुआ जो कालांतर में अपभ्रंशित होकर डीडवाना कहलाया।


डीडवाना मध्यकालीन मुगल साम्राज्य में एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा है जिसका कारण यहां प्रसिद्ध नमक की झील है जिससे नमक तैयार कर पूरे भारत में भेजा जाता रहा है। इस झील पर अधिकार को लेकर गुजरात के बादशाहोंं व जोधपुर,बीकानेर,जयपुर के शासको मध्य कई लड़ाईयां लड़ी गई। चित्तौड़ के महाराणा कुंभा ने यहां अधिकार कर नमक पर कर लगाया जिसका उल्लेख कीर्ति स्तंभ के शिलालेख में है।यह राजस्थान की सांभर झील के बाद दूसरी महत्वपूर्ण व बड़ी झील है जो तीन वर्ग किलोमीटर में क्षेत्र में फैली है।


डीडवाना आजादी से पूर्व मारवाड़ (जोधपुर) रियासत का एक परगना (जिला) था, जिसे आजादी बाद में नागौर जिले में सम्मलित कर लिया था। जोधपुर राज्य की पूर्वी सीमा पर स्थित यह नगर मारवाड़,शेखावाटी एवं बीकानेर रियासतो की संगम स्थली भी रहा है। यही कारण है कि यहां के निवासियों की भाषा, रीति रिवाजों आदि पर तीनो देशी रियासतों का मिश्रित प्रभाव देखने को मिलता हैं।


डीडवाना का कोई संकलित इतिहास नही है, किन्तु यहां किए गए उत्खलन से पता चला है कि मानव जाति के पूर्वजो की गतिविधियां यहां रही है। शहर के पास बांगड़ नहर के बहाव क्षेत्र में 700 मीटर चौड़े एवं 300 मीटर चौड़े दो रेतीले टीले मानव विकास के साक्षी रहे है। डेक्कन कॉलेज, पुणे के भूगर्भ शास्त्री प्रो.वी.एन. मिश्रा एवं एस.एन राजगुरू ने यहां 80 के दशक में खुदाई की थी । उन्हे छोटे औजार, काटने के बड़े औजार जैसे चैपर, पोलीहैंड्रोस, स्पेरोईड्स सहित करीब 1300 आर्टिफैक्ट्स मिले। इनकी रेडियो डेटिंग उम्र 7 लाख 97 हजार वर्ष आंकी गई है । आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने इन टीलोंं को "16 आर" नाम दिया है। आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया अपने इतिहास में पहली बार इन मिट्टी के टीलों का संरक्षण करेगा। पेरिस के राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय के प्रागैतिहासिक विभाग की क्लेरी गेलार्ड व उनके सहयोगियो ने 16 आर पर शोध किया।


डीडवाना का इतिहास शिलालेखों के आधार पर लगभग 2000 वर्ष प्राचीन बताया जाता है। एक शिलालेख के अनुसार 43 ईस्वी से 255 ई. के मध्य वर्तमान शहर से 3 किमी दूर पूर्व दिशा में "आभानगरी" के नाम से नगर बसाया गया जो कुषाण साम्राज्य के अधीन रहा। कालान्तर में क्षत्रप शासको के आक्रमणों के यह नगर उजड़ गया। एक अन्य शिलालेख के अनुसार नवीं शताब्दी में 843 ई. में नागभट्ट द्वितीय ने डीडवाना क्षेत्र का 1/6 भाग किसी ब्राह्मण को दान किया था। इसी क्षेत्र के प्रधानमंत्री शेषराम के पुत्र डीडूशाह ने वर्तमान स्थान पर डीडुवाणक नाम से पुन: नगर बसाया जो कालान्तर में डीडवाना कहलाया। इस के बाद इसका शासन मंडोर के प्रतिहारो के पास चला गया। डीडवाना से प्रतिहार कालीन योग नारायण की प्रतिमा प्राप्त हुई जो वर्तमान में जोधपुर संग्रहालय में रखी है। इस दौरान डीडवाना जैन एवं हिन्दू धर्म का केन्द्र भी बना किन्तु मुस्लिम आक्रमणों के कारण यहां के प्राचीन मंदिर नष्ट कर दिए गये । आज भी पुराने शहर में खुदाई में मंदिरो के टुकड़े व मुर्तियां मिलती रहती है। दसवीं सदी में जैन मुनि जिनेश्वर सूरि ने डीडवाना में कथाकोष की रचना की । विख्यात जैन विद्वान श्रीदत्त सूरि ने डीडवाना की यात्रा की तथा यहां के शासक यशोभद्र को उपदेश दिया। यशोभद्र ने डीडवाना में "चौबीसा हिमालय" नामक एक विशाल जैन मंदिर का निर्माण कराया जो 1184 ई.तक अस्तित्व में था, सोमप्रभाचार्य ने 1184 ई. में इस जिनालय का उल्लेख किया है। खुदाई में प्राप्त जैन प्रतिमाएं इस का प्रमाण है। बारहवीं शताब्दी में सिद्धसेन सूरि द्वारा रचित सकलतीर्थ माला में भी डीडवाना का उल्लेख है।


तराईन के युद्ध के बाद यह क्षेत्र मुहम्मद गौरी के हाथो में चला गया। इस के बाद कुतूबुद्दीन ऐकब के पास 1206 ई. से 1210 ई.तक रहा। इसके बाद 1226 ई. से 1236 ई. तक इल्तुतमिश तथा 1242 ई. में रजिया सुल्तान के कब्जे में रहा। डीडवाना पर गुजरात के बादशाहों ने भी नमक के लिए कब्जा किया। चितौड़ के महाराणा कुंभा ने यहां कब्जा कर नमक पर कर लगाया जिसका उल्लेख कीर्तिस्तंभ के शिलालेख में किया है। मुगलों नें यहां अपने थाने स्थापित किए।.इस दौरान मुगलों ने यहां मस्जिदों का निर्माण कराया। जोधपुर के राव मालदेव के ने अपने सेनापति राव कूंपा को डीडवाना की जागीरी प्रदान की। कूंपा ने यहां शेरशाह सूरी से युद्ध लड़ा। मुगलो के हाथों से यह पुनः जोधपुर राज्य के अन्तर्गत चला गया । 1708 ई. में डीडवाना पर जोधपुर व जयपुर राज्य का संयुक्त शासन भी रहा। इसके बाद झुंझूनू के नवाब ने भी डीडवाना को अपनी रियासत के अधीन किया। मराठों ने भी डीडवाना व दौलतपुरा पर आक्रमण कर इन पर अधिकार किया। 18वीं शताब्दी के मध्य में जोधपुर नरेश महाराजा बख्तसिंह ने इसे मारवाड़ रियासत में मिला लिया। इस के बाद डीडवाना जोधपुर राज्य का परगना बना रहा जिस के अंतर्गत लाडनूं, बड़ी बेरी, नहवा, लेड़ी और तोसीणा जागीरी ठिकाने आते थे । स्वतंत्रता के पश्चात 1950 में जोधपुर राज्य का राजस्थान में विलय हो गया और नागौर जिले का वर्तमान स्वरूप बना जिस में डीडवाना सम्मलित हो गया।


पण्डित बच्छराज व्यास

"तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे ना रहे" जैसी कविता के रचियता जनसंघ के नेता डीडवाना निवासी बच्छराज व्यास का जन्म 24 सितंबर 1916 को हुआ। पं.व्यास नागपुर के संघ मुख्यालय से अपना कार्य करते रहे। बालासाहब व हेडगेवार के कहने पर बच्छराज जी 1944 से 1947 तक राजस्थान में संघ का प्रचार करते रहे इस दौरान श्री व्यास ने अपने गृहनगर डीडवाना में राजस्थान की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रथम शाखा की स्थापना कर नगर को गौरव प्रदान किया। 1965 में पं.व्यास जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गये। व्यास के पं.दीनदयाल उपाद्याय, डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी के साथ सीधा संम्पर्क था। व्यास 1958 से 1962 तक महाराष्ट्र विधानपरिषद् के सदस्य रहे। इनका निधन 1972 को हुआ। व्यास की स्मृति में नागपुर के एक चौराहे का नामकरण उनके नाम पर किया गया व डीडवाना एवं नागपुर में आदर्श विद्या मंदिर का निर्माण किया गया। पं. व्यास के पुत्र गिरीश व्यास वर्तमान में महाराष्ट्र विधानपरिषद् के अध्यक्ष है।


मथुरादास माथुर

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स्वंत्रतता सेनानी एवं जोधपुुुर निवासी मथुरादास माथुर डीडवाना के पहले विधायक चुने गये। इन्होने राजस्थान विधानसभा में 1952, 1967 एवं 1977 में तीन बार डीडवाना का प्रतिनिधित्व किया, जो कि डीडवाना सीट का रिकॉड है। 1967 में मोहनलाल सुखाड़िया सरकार में मंत्री भी रहे। माथुर दूसरे लोकसभा चुनाव में नागौर सीट से जीत कर सांसद बने। इनकी स्मृति में जोधपुर में मथुरादास माथुर अस्पताल बना हुआ है।


हरिशंकर भाभड़ा

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राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री रहे हरिशंकर भाभड़ा का जन्म 6 अगस्त 1928 को डीडवाना में हुआ। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए। स्वतंत्रता के बाद भाभड़ा भारतीय जनसंघ की प्रदेश इकाई के कोषाध्यक्ष व उपाध्यक्ष भी रहे। 1963 में डीडवाना पूरे राजस्थान में एक ही नगरपालिका थी जिसमें गैर कांग्रेसी सदस्यों का बहुमत था, भाभड़ा इस के अध्यक्ष बने। आपातकाल में 18 माह जेल में बिताए। 1978 से 1984 तक भाभड़ा राज्यसभा के सदस्य रहे। 1985 से 1993 तक चूरु जिले की रतनगढ़ सीट से विधायक रहे। भाभड़ा 9वीं व 10वीं विधानसभा के अध्यक्ष चुने गये। 1994 में भैरौसिंह शेखावत सरकार में उपमुख्यमंत्री बने। 2003 के चुनावों में भाभड़ा पराजित हुए परन्तु वसुंधरा सरकार में उन्हे केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त हुआ।

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